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mahabharat 13.87.31: भगवान बोले- मेढकों! अग्निदेव के शाप के कारण तुम्हारी जीभ नष्ट नहीं होगी; अतः तुम रसों के ज्ञान से रहित रहोगे, तथापि हमारी कृपा से तुम नाना प्रकार की वाणी बोल सकोगे॥31॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.87.31 
देवा ऊचु:
अग्निशापादजिह्वापि रसज्ञानबहिष्कृता:।
सरस्वतीं बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
भगवान बोले- मेढकों! अग्निदेव के शाप के कारण तुम्हारी जीभ नष्ट नहीं होगी; अतः तुम रसों के ज्ञान से रहित रहोगे, तथापि हमारी कृपा से तुम नाना प्रकार की वाणी बोल सकोगे॥31॥
 
God said-Frogs! Due to the curse of Agnidev, you will not lose your tongue; Therefore, you will remain void of the knowledge of Rasas, however, with our grace you will be able to utter different types of speech. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)