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mahabharat 13.87.29: मेंढक को श्राप देकर वे तुरंत ही किसी अन्य स्थान पर रहने चले गए। सर्वव्यापी अग्नि प्रकट नहीं हुई।   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  13.87.29 
तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ।
अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मेंढक को श्राप देकर वे तुरंत ही किसी अन्य स्थान पर रहने चले गए। सर्वव्यापी अग्नि प्रकट नहीं हुई।
 
After cursing the frog, they immediately went to live in another place. The omnipresent fire did not reveal itself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)