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mahabharat 13.87.28: अग्निदेव ने समझ लिया कि मेंढक ने उनसे चुगली की है; अतः वे उसके पास गए और उसे शाप दिया कि ‘तुम्हें स्वाद का अनुभव नहीं होगा’॥ 28॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.87.28 
हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम्।
शशाप स तमासाद्य न रसान् वेत्स्यसीति वै॥ २८॥
 
 
अनुवाद
अग्निदेव ने समझ लिया कि मेंढक ने उनसे चुगली की है; अतः वे उसके पास गए और उसे शाप दिया कि ‘तुम्हें स्वाद का अनुभव नहीं होगा’॥ 28॥
 
Agnidev understood that the frog had gossiped with him; so he went to him and cursed him saying, 'You will not experience the taste'.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)