vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध
»
श्लोक 27
श्लोक
13.87.27
गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात् सुरा:।
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत्॥ २७॥
अनुवाद
"देवताओं! आप जा सकते हैं। हम भी अग्नि के भय से कहीं और चले जाएँगे।" इतना कहकर मेंढक तुरन्त जल में उतर गया।
"Gods! You may go. We too will go elsewhere out of fear of the fire." Saying just this, the frog immediately entered the water.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd