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mahabharat 13.87.25: देवताओं! भगवान अग्निदेव ने अपना तेज जल में मिलाकर जल में शयन किया है। हम लोग उनके तेज से पीड़ित हो रहे हैं॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.87.25 
स संसुप्तो जले देवा भगवान‍् हव्यवाहन:।
अप: संसृज्य तेजोभिस्तेन संतापिता वयम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
देवताओं! भगवान अग्निदेव ने अपना तेज जल में मिलाकर जल में शयन किया है। हम लोग उनके तेज से पीड़ित हो रहे हैं॥ 25॥
 
‘Gods! Lord Agnidev has combined his radiance with water and is sleeping in the water. We are getting tormented by his radiance.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)