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mahabharat 13.87.24: हे देवताओं! अग्नि रसातल में निवास करती है। हे प्रभु! मैं अग्नि की पीड़ा से भयभीत होकर यहाँ आया हूँ।   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  13.87.24 
रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो।
संतापादिह सम्प्राप्त: पावकप्रभवादहम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे देवताओं! अग्नि रसातल में निवास करती है। हे प्रभु! मैं अग्नि की पीड़ा से भयभीत होकर यहाँ आया हूँ।
 
‘O Gods! Agni resides in the abyss. O Lord! I have come here in fear of the agony caused by the fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)