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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.87.17 
जगत‍्पतिरनिर्देश्य: सर्वग: सर्वभावन:।
हृच्छय: सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभु:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अग्निदेव इस जगत के रक्षक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियों के हृदय में शयन करने वाले, सर्वशक्तिमान तथा रुद्र से भी वरिष्ठ हैं।
 
Agnidev is the guardian of this world, indescribable, omnipresent, producer of all, sleeping in the hearts of all living beings, omnipotent and senior than Rudra.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)