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श्लोक 13.87.168  |
तस्मात् त्वमपि विप्रेभ्य: प्रयच्छ कनकं बहु।
ददत्सुवर्णं नृपते किल्बिषाद् विप्रमोक्ष्यसि॥ १६८॥ |
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| अनुवाद |
| अतः हे मनुष्यों के स्वामी! अब आप भी ब्राह्मणों को बहुत सा सोना दान करें। सोना दान करने से आप पापों से मुक्त हो जायेंगे। (168) |
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| Therefore, O Lord of men! Now you too should donate a lot of gold to the Brahmins. By donating gold you will be freed from sins. 168. |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम पञ्चाशीतितमोऽध्याय:॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्तिविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८५॥
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