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mahabharat 13.87.165: हे प्रभु! हे दानवीरश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें स्वर्ण दान का माहात्म्य समझाया है। अतः अब तुम ब्राह्मणों को स्वर्ण दान करो। (165)   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  13.87.165 
सुवर्णदाने च मया कथितास्ते गुणा विभो।
तस्मात् सुवर्णं विप्रेभ्य: प्रयच्छ ददतां वर॥ १६५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे दानवीरश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें स्वर्ण दान का माहात्म्य समझाया है। अतः अब तुम ब्राह्मणों को स्वर्ण दान करो। (165)
 
O Lord! O best of donors! Thus I have explained to you the significance of donating gold. Therefore, now donate gold to Brahmins. 165.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)