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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  13.87.163 
कार्तिकेयस्तु संवृद्ध: कालेन महता तदा।
देवै: सेनापतित्वेन वृत: सेन्द्रैर्भृगूद्वह॥ १६३॥
 
 
अनुवाद
हे भृगुश्रेष्ठ! जब बहुत समय के बाद कार्तिकेय बड़े हुए, तब इन्द्र आदि देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति चुना।।163।।
 
O best of Bhrigu! When Kartikeya grew up after a long time, then the gods like Indra chose him as their commander. 163.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)