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mahabharat 13.87.159: सोना अक्षय द्रव्य है, जो मनुष्य इसका दान करता है, उसे पुण्य लोकों से नीचे नहीं जाना पड़ता। इस लोक में वह महान यश प्राप्त करता है और परलोक में अनेक समृद्ध पुण्य लोकों को प्राप्त करता है। 159॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 159
 
 
श्लोक  13.87.159 
न च क्षरति तेभ्यश्च यशश्चैवाप्नुते महत्।
सुवर्णमक्षयं दत्त्वा लोकांश्चाप्नोति पुष्कलान्॥ १५९॥
 
 
अनुवाद
सोना अक्षय द्रव्य है, जो मनुष्य इसका दान करता है, उसे पुण्य लोकों से नीचे नहीं जाना पड़ता। इस लोक में वह महान यश प्राप्त करता है और परलोक में अनेक समृद्ध पुण्य लोकों को प्राप्त करता है। 159॥
 
Gold is an inexhaustible substance, the person who donates it does not have to descend from the virtuous worlds. In this world he attains great fame and in the next world he attains many prosperous virtuous worlds. 159॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)