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mahabharat 13.87.158: मरने के बाद जब वह परलोक में जाता है, तब वह अद्वितीय और पुण्यात्मा माना जाता है। उसकी गति में कहीं कोई बाधा नहीं होती और वह अपनी इच्छानुसार जहाँ चाहता है, वहाँ विचरण करता है।॥158॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  13.87.158 
तत: सम्पद्यतेऽन्येषु लोकेष्वप्रतिम: सदा।
अनावृतगतिश्चैव कामचारो भवत्युत॥ १५८॥
 
 
अनुवाद
मरने के बाद जब वह परलोक में जाता है, तब वह अद्वितीय और पुण्यात्मा माना जाता है। उसकी गति में कहीं कोई बाधा नहीं होती और वह अपनी इच्छानुसार जहाँ चाहता है, वहाँ विचरण करता है।॥158॥
 
After death, when he goes to the other world, he is considered to be a unique and virtuous soul. There is no resistance to his movement anywhere and he roams wherever he wants according to his wish.॥158॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)