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mahabharat 13.87.156: जो मनुष्य व्रत रखता है और सायंकाल में स्वर्ण दान करता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और चन्द्रमा के लोकों में जाता है ॥156॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  13.87.156 
ददाति पश्चिमां संध्यां य: सुवर्णं यतव्रत:।
ब्रह्मवाय्वग्निसोमानां सालोक्यमुपयाति स:॥ १५६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य व्रत रखता है और सायंकाल में स्वर्ण दान करता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और चन्द्रमा के लोकों में जाता है ॥156॥
 
One who observes a fast and donates gold in the evening, goes to the worlds of Brahma, Vayu, Agni and Moon. 156॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)