श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  13.87.154 
आदित्योदयसम्प्राप्ते विधिमन्त्रपुरस्कृतम्।
ददाति काञ्चनं यो वै दु:स्वप्नं प्रतिहन्ति स:॥ १५४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सूर्योदय के समय विधिपूर्वक मंत्र पढ़कर स्वर्ण दान करता है, उसके पाप और दुःस्वप्न नष्ट हो जाते हैं ॥154॥
 
He who donates gold at sunrise after reciting the prescribed mantras, destroys his sins and nightmares.॥ 154॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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