श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  13.87.153 
तस्य चातमसो लोका गच्छत: परमां गतिम्।
स्वर्लोके राजराज्येन सोऽभिषिच्येत भार्गव॥ १५३॥
 
 
अनुवाद
सुवर्ण का दान करनेवाला परम मोक्ष को प्राप्त होता है, उसे अंधकार रहित प्रकाशमय लोक की प्राप्ति होती है। हे भृगुपुत्र! स्वर्ग में वह राजाओं का राजा (कुबेर) पद पर अभिषिक्त होता है। ॥153॥
 
The donor of gold attains the ultimate salvation, he gets the luminous world without darkness. O son of Bhrigu! In heaven he is anointed as the King of Kings (Kubera). ॥153॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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