श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 149-150
 
 
श्लोक  13.87.149-150 
कुशस्तम्बे जुहोत्यग्निं सुवर्णे तत्र च स्थिते।
वल्मीकस्य वपायां च कर्णे वाजस्य दक्षिणे॥ १४९॥
शकटोर्व्यां परस्याप्सु ब्राह्मणस्य करे तथा।
हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन्यते॥ १५०॥
 
 
अनुवाद
कुशा के ढेर पर, उस पर रखे हुए सोने पर, कुएँ के गड्ढे में, बकरे के दाहिने कान पर, गाड़ी के गुजरने वाली भूमि पर, दूसरे के जलाशय में तथा ब्राह्मण के हाथ पर, वैदिक रीति को मानने वाले पुरुष अग्निदेव को अग्निस्वरूप मानकर होम आदि अनुष्ठान करते हैं और होम अनुष्ठान के पूर्ण होने पर भगवान अग्निदेव को सुखमय समृद्धि का अनुभव होता है॥149-150॥
 
On a pile of kusha grass, on the gold kept on it, in a hole in a well, on the right ear of a goat, on the land on which a cart passes, in a water reservoir belonging to someone else and on the hand of a Brahmin, men who accept the Vedic tradition perform rituals like homa etc. considering God Agni as the form of fire and on the completion of the homa rituals, Lord Agnidev experiences blissful prosperity.॥ 149-150॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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