श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 148
 
 
श्लोक  13.87.148 
अग्न्यभावे च कुरुते वह्निस्थानेषु काञ्चनम्।
जामदग्न्य प्रमाणज्ञो वेदश्रुतिनिदर्शनात्॥ १४८॥
 
 
अनुवाद
जमदग्निपुत्र परशुराम! वेदों के प्रमाणों को जानने वाला मनुष्य वैदिक श्रुति के उदाहरण के अनुसार अग्नि के अभाव में उसके स्थान पर सुवर्ण का उपयोग करता है ॥148॥
 
Jamadagni's son Parashurama! A person having knowledge of the evidence of the Vedas uses gold in place of fire in the absence of it as per the example of the Vedic Shruti. ॥148॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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