| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध » श्लोक 146 |
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| | | | श्लोक 13.87.146  | एवमेतत् पुरा वृत्तं तस्य यज्ञे महात्मन:।
देवश्रेष्ठस्य लोकादौ वारुणीं बिभ्रतस्तनुम्॥ १४६॥ | | | | | | अनुवाद | | इस प्रकार प्राचीन काल में जब सृष्टि के आरम्भ का समय था, तब वरुण के शरीर वाले श्रेष्ठ महात्मा रुद्र के यज्ञ में उपर्युक्त घटना घटी। | | | | Thus, in ancient times, when it was the time of beginning of creation, the above mentioned incident took place in the yagya of Rudra, the best Mahatma having the body of Varuna. | | ✨ ai-generated | | |
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