श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  13.87.144 
ते त्वनेनैव रूपेण प्रजनिष्यन्ति वै प्रजा:।
स्थापयिष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा॥ १४४॥
 
 
अनुवाद
‘प्रजापति इसी रूप में प्रजा की रचना करेंगे और सृष्टि के आदि से प्रलय के अंत तक अपने को मर्यादा में रखेंगे ॥144॥
 
‘The Prajapatis will create the people in this form and will keep themselves within limits from the beginning of creation till the end of destruction.’॥ 144॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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