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mahabharat 13.87.143: पितामह! कश्यप से लेकर भृगुवंशपर्यन्त हम सब आपकी ही संतान हैं - ऐसा समझकर हम अपनी भूलों के लिए आपसे क्षमा मांगते हैं॥143॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  13.87.143 
मारीचमादित: कृत्वा सर्वे चैवाथ भार्गवा:।
अपत्यानीति सम्प्रेक्ष्य क्षमयाम पितामह॥ १४३॥
 
 
अनुवाद
पितामह! कश्यप से लेकर भृगुवंशपर्यन्त हम सब आपकी ही संतान हैं - ऐसा समझकर हम अपनी भूलों के लिए आपसे क्षमा मांगते हैं॥143॥
 
Grandfather! Starting from Kashyap to the Bhrigu dynasty, all of us are your children - considering this, we seek your forgiveness for our mistakes.॥ 143॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)