श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  13.87.141 
देवपक्षचरा: सौम्या: प्राजापत्या महर्षय:।
आप्नुवन्ति तपश्चैव ब्रह्मचर्यं परं तथा॥ १४१॥
 
 
अनुवाद
वे सब लोग सौम्य स्वभाव के हों। प्रजापतियों के वंश में उत्पन्न होने वाले ये महर्षि सदैव देवताओं के पक्ष में रहते हैं और तप एवं उत्तम ब्रह्मचर्य के बल को प्राप्त करते हैं ॥141॥
 
Let all of them have a gentle nature. These Maharishis, born in the lineage of Prajapatis, always remain on the side of the gods and attain the strength of penance and perfect celibacy. 141॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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