श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  13.87.135 
एवमङ्गिरसश्चैव कवेश्च प्रसवान्वयै:।
भृगोश्च भृगुशार्दूल वंशजै: सततं जगत‍्॥ १३५॥
 
 
अनुवाद
हे भृगु! इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अंगिरा, कवि और भृगु की वंश परम्पराओं से परिपूर्ण है।
 
O great Bhrigu! In this way the entire world is filled with the descendants and traditions of Angira, Kavi and Bhrigu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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