| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध » श्लोक 130-131 |
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| | | | श्लोक 13.87.130-131  | अष्टौ चांगिरस: पुत्रा वारुणास्तेऽप्युदाहृता:।
बृहस्पतिरुतथ्यश्च पयस्य: शान्तिरेव च॥ १३०॥
घोरो विरूप: संवर्त: सुधन्वा चाष्टम: स्मृत:।
एतेऽष्टौ वह्निजा: सर्वे ज्ञाननिष्ठा निरामया:॥ १३१॥ | | | | | | अनुवाद | | अंगिरा के आठ पुत्र हुए, इन्हें वरुण भी कहते हैं (वरुण के यज्ञ में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम वरुण पड़ा)। इनके नाम इस प्रकार हैं - बृहस्पति, उतथ्य, पयस्य, शांति, घोर, विरूप, संवर्त और आठवाँ सुधन्वा। ये आठों अग्नि के वंश में उत्पन्न हुए थे। अतः ये आग्नेय कहलाते हैं। ये सभी ज्ञानी तथा रोग-शोक से रहित हैं ॥130-131॥ | | | | Angira has eight sons, they are also called Varun (he was named Varun because he was born in Varun's yagya). Their names are as follows – Brihaspati, Utthya, Payasya, Shanti, Ghor, Virupa, Samvarta and the eighth Sudhanva. These eight were born in the lineage of Agni. Hence they are called igneous. All of them are knowledgeable and free from disease and sorrow. 130-131॥ | | ✨ ai-generated | | |
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