Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.87.123-124: तत्पश्चात् ब्रह्माजी की आज्ञा से भगवान शिव ने जलचरों के स्वामी वरुण के रूप में सर्वप्रथम सूर्य के समान तेजस्वी भृगु को अपना पुत्र स्वीकार किया, तत्पश्चात् स्वयं अंगिरा को अग्नि का पुत्र माना ॥123-124॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 123-124
 
 
श्लोक  13.87.123-124 
निसर्गाद्‍ब्रह्मणश्चापि वरुणो यादसाम्पति:॥ १२३॥
जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम्।
ईश्वरोऽङ्गिरसं चाग्नेरपत्यार्थमकल्पयत्॥ १२४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् ब्रह्माजी की आज्ञा से भगवान शिव ने जलचरों के स्वामी वरुण के रूप में सर्वप्रथम सूर्य के समान तेजस्वी भृगु को अपना पुत्र स्वीकार किया, तत्पश्चात् स्वयं अंगिरा को अग्नि का पुत्र माना ॥123-124॥
 
Then, by the order of Brahma, Lord Shiva in the form of Varuna, the lord of aquatic animals, first accepted Bhrigu, who was as radiant as the Sun, as his son. Then he himself decided Angira as the son of Agni. ॥123-124॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)