श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  13.87.120 
अहं कर्ता हि सत्रस्य होता शुक्रस्य चैव ह।
यस्य बीजं फलं तस्य शुक्रं चेत् कारणं मतम्॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
‘मैं ही यज्ञ करनेवाला हूँ और अपने वीर्य को हविरूप में अर्पित करनेवाला हूँ। जिसके पास बीज है, उसे उसका फल मिलता है। यदि वीर्य को ही इनके जन्म का कारण माना जाए, तो ये निश्चय ही मेरे पुत्र हैं।’॥120॥
 
‘I am the performer of the sacrifice and the one who offers my semen as oblation. The one who has the seed gets its fruits. If semen is considered to be the reason for their birth, then these are definitely my sons.’॥120॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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