श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  13.87.118 
अग्निरुवाच
मदङ्गेभ्य: प्रसूतानि मदाश्रयकृतानि च।
ममैव तान्यपत्यानि वरुणो ह्यवशात्मक:॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
अग्नि ने कहा- ये तीनों बालक मेरे ही शरीर के अंगों से उत्पन्न हुए हैं और विधाता ने इन्हें मेरे संरक्षण में उत्पन्न किया है। अतः ये तीनों मेरे पुत्र हैं। वरुणरूपी महादेवजी का इन पर कोई अधिकार नहीं है ॥118॥
 
Agni said- These three children have been born from my body parts and the Creator has created them under my protection. Hence these three are my sons. Mahadevji in the form of Varun has no authority over them. ॥ 118॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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