श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  13.87.116 
ततोऽब्रवीन्महादेवो वरुण: पवनात्मक:।
मम सत्रमिदं दिव्यमहं गृहपतिस्त्विह॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
तब वरुण और वायु रूपी महादेव ने कहा, "हे देवताओं! यह मेरा दिव्य यज्ञ है। मैं इस यज्ञ का गृहस्थ यजमान हूँ।"
 
Then Varuna and Mahadeva in the form of Vayu said, 'O Gods! This is my divine sacrifice. I am the householder Yajaman of this sacrifice.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd