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mahabharat 13.87.115: इस सृष्टि के आदि रचयिता ब्रह्माजी कहते हैं कि अग्नि परम ब्रह्म का स्वरूप है। वे अविनाशी परम ब्रह्म हैं और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। यह रहस्य ज्ञानी पुरुष ही प्रकट करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  13.87.115 
आदिकर्ता च लोकस्य तत्परं ब्रह्म तद्‍ध्रुवम्।
सर्वकामदमित्याहुस्तद्रहस्यमुवाच ह॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
इस सृष्टि के आदि रचयिता ब्रह्माजी कहते हैं कि अग्नि परम ब्रह्म का स्वरूप है। वे अविनाशी परम ब्रह्म हैं और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। यह रहस्य ज्ञानी पुरुष ही प्रकट करते हैं।
 
Brahmaji, the original creator of this world, says that Agni is the form of the Supreme Brahma. He is the indestructible Supreme Brahma and he is the one who fulfils all desires. This secret is revealed by wise men.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)