श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  13.87.110 
शेषा: प्रजानां पतय: स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे।
ऋषयो रोमकूपेभ्य: स्वेदाच्छन्दो बलान्मन:॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
शेष प्रजापति उसके श्रवण आदि इन्द्रियों से उत्पन्न हुए। रोमों से ऋषि, पसीने से छंद और वीर्य से मन उत्पन्न हुआ ॥110॥
 
The remaining Prajapatis were born from his senses like hearing etc. Rishi was born from hair follicles, verse was born from sweat and mind was born from semen. 110॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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