श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  13.87.103 
तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभयम्।
स गुणस्तेजसो नित्यस्तस्य चाकाशमेव च॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
तमोमय भाग से स्थावर वृक्ष आदि तामसिक वस्तुएँ प्रकट हुईं और सात्त्विक भाग राजस और तमस दोनों में समा गया। वह सत्त्वगुण अर्थात् प्रकाशस्वरूप बुद्धि का सनातन स्वरूप है और आकाश आदि सम्पूर्ण जगत् भी उस बुद्धि का कार्य होने के कारण उसका ही स्वरूप है ॥103॥
 
From the Tamomaya part, Tamasic objects like immovable trees etc. appeared and the Sattvik part got incorporated into both Rajas and Tamas. That Sattvagun i.e. the form of light is the eternal form of the intellect and the entire universe like the sky is also its form due to being the work of that intellect. 103॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd