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mahabharat 13.87.101: भृगु नन्दन! वीर्य स्खलित होते ही उन्होंने उसे पात्र में ले लिया और स्वयं मन्त्र पढ़ते हुए उसे घी के समान आहुति दे दी॥101॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.87.101 
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण परिगृह्य स:।
आज्यवन्मन्त्रतश्चापि सोऽजुहोद् भृगुनन्दन॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
भृगु नन्दन! वीर्य स्खलित होते ही उन्होंने उसे पात्र में ले लिया और स्वयं मन्त्र पढ़ते हुए उसे घी के समान आहुति दे दी॥101॥
 
Bhrigu Nandan! As soon as the semen was ejaculated, he took it in the vessel and while reciting mantras himself offered it like ghee.॥ 101॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)