श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.87.1 
देवा ऊचु:
असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवर: प्रभो।
सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
देवताओं ने कहा, "हे प्रभु! तारक नामक दैत्य, जिसे आपने आशीर्वाद दिया है, देवताओं और ऋषियों को बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः कृपया उसके वध का कोई उपाय कीजिए।"
 
The gods said, "O Lord! The demon named Tarak, whom you have blessed, is causing great trouble to the gods and sages. So please find a way to kill him."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd