Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.86.77: यद्यपि रुद्रदेव ने उस समय अपने अतुलनीय तेज (वीर्य) को रोक रखा था, तथापि उनका थोड़ा-सा वीर्यपात हुआ और वे वहीं पृथ्वी पर गिर पड़े।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  13.86.77 
रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा।
प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि रुद्रदेव ने उस समय अपने अतुलनीय तेज (वीर्य) को रोक रखा था, तथापि उनका थोड़ा-सा वीर्यपात हुआ और वे वहीं पृथ्वी पर गिर पड़े।
 
Although Rudradev had at that time restrained his matchless energy (semen), yet he ejaculated a little and fell on the earth there itself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)