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mahabharat 13.86.66: विशाललोचन! जगत के स्वामी! हम सभी देवता आपके चरणों में हैं। तीनों लोकों के कल्याण हेतु हमें वर प्रदान करें।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  13.86.66 
तदेभ्य: प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्य: पृथुलोचन।
वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
विशाललोचन! जगत के स्वामी! हम सभी देवता आपके चरणों में हैं। तीनों लोकों के कल्याण हेतु हमें वर प्रदान करें।
 
Vishallochan! Lord of the world! We all gods are at your feet. For the welfare of the three worlds, please grant us a boon.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)