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mahabharat 13.86.58: समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विप्रर्ष है! मैं तुम्हें पुनः स्वर्ण का माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो॥58॥   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.86.58 
भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे।
गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विप्रर्ष है! मैं तुम्हें पुनः स्वर्ण का माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो॥58॥
 
The best among all the armed men is Viprarsha! I am again telling you the greatness of gold, listen carefully. 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)