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mahabharat 13.86.57: मानसिंह! इसलिए ऐसा माना जाता है कि जो लोग स्वर्ण दान करते हैं, उन्होंने सभी देवताओं का दान कर दिया है। इसलिए विद्वान पुरुष स्वर्ण से बढ़कर किसी अन्य दान को श्रेष्ठ नहीं मानते।'   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  13.86.57 
तस्मात् सुवर्णं ददता दत्ता: सर्वा: स्म देवता:।
भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यत: परमं विदु:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
मानसिंह! इसलिए ऐसा माना जाता है कि जो लोग स्वर्ण दान करते हैं, उन्होंने सभी देवताओं का दान कर दिया है। इसलिए विद्वान पुरुष स्वर्ण से बढ़कर किसी अन्य दान को श्रेष्ठ नहीं मानते।'
 
‘Mansingh! Therefore it is believed that those who donate gold have donated all the gods. Therefore learned men do not consider any other donation to be better than gold. 57.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)