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mahabharat 13.86.55: सभी दानों में सोना ही एकमात्र भेंट है; इसलिए जो लोग सोना दान करते हैं, वे वास्तव में सब कुछ दान कर रहे होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  13.86.55 
सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते।
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
सभी दानों में सोना ही एकमात्र भेंट है; इसलिए जो लोग सोना दान करते हैं, वे वास्तव में सब कुछ दान कर रहे होते हैं।
 
In all gifts, gold is the only offering; therefore, those who donate gold are actually donating everything.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)