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mahabharat 13.86.53: विभु! भूमि, गौ आदि सभी वस्तुओं में स्वर्ण का दान सबसे बड़ा दान है।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  13.86.53 
पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन।
विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
विभु! भूमि, गौ आदि सभी वस्तुओं में स्वर्ण का दान सबसे बड़ा दान है।
 
Vibhu! The donation of gold is the greatest donation of all the things like earth, cow etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)