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mahabharat 13.86.50: इसीलिए देवता, गंधर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच - ये सभी बड़े यत्न से सोना पहनते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.86.50 
एतस्मात् कारणाद् देवा गन्धर्वोरगराक्षसा:।
मनुष्याश्च पिशाचाश्च प्रयता धारयन्ति तत्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
इसीलिए देवता, गंधर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच - ये सभी बड़े यत्न से सोना पहनते हैं।
 
That is why gods, Gandharvas, snakes, demons, humans and vampires - all of them wear gold with great effort.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)