श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.86.5 
वेदोपनिषदश्चैव सर्वकर्मसु दक्षिणा:।
सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वेदों और उपनिषदों ने भी प्रत्येक अनुष्ठान में दक्षिणा का विधान किया है। सभी यज्ञों में भूमि, गौ और स्वर्ण के रूप में दक्षिणा निर्धारित की गई है॥5॥
 
Vedas and Upanishads have also prescribed dakshina in every ritual. In all yagnas, dakshina in the form of land, cow and gold has been prescribed.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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