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mahabharat 13.86.44: तत्पश्चात् कठोर व्रत धारण करने वाले भगवान वसिष्ठ ने कहा, 'परशुराम! अग्नि के समान चमकता हुआ सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, उसे सुनो।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  13.86.44 
ततोऽब्रवीद् वसिष्ठस्तं भगवान‍् संशितव्रत:।
शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् कठोर व्रत धारण करने वाले भगवान वसिष्ठ ने कहा, 'परशुराम! अग्नि के समान चमकता हुआ सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, उसे सुनो।
 
Thereafter Lord Vasishtha, who was observing a strict fast, said, 'Parashuram! Listen to the way the gold shining like fire has appeared.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)