श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.86.43 
दग्ध्वा लोकान् पुरा वीर्यात् सम्भूतमिह शुश्रुम।
सुवर्णमिति विख्यातं तद् ददत् सिद्धिमेष्यसि॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उस वस्तु का नाम सोना है। हमने सुना है कि प्राचीन काल में अग्निदेव ने सम्पूर्ण जगत को भस्म करके अपने वीर्य से सोना प्रकट किया था। उसी का दान करने से तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। 43॥
 
The name of that thing is gold. We have heard that in ancient times, Agni had incinerated the entire world and manifested gold from his semen. By donating the same you will attain success. 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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