Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.86.42: हे ब्रह्मर्षि! एक अन्य वस्तु के दान की बात सुनो। वह वस्तु परम पवित्र है। उसका आकार अत्यंत अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्नि से उत्पन्न हुई है।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.86.42 
अन्यद् दानं तुु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत्।
दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदस:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि! एक अन्य वस्तु के दान की बात सुनो। वह वस्तु परम पवित्र है। उसका आकार अत्यंत अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्नि से उत्पन्न हुई है।
 
O Brahmarshi! Listen to the donation of another thing. That thing is the most sacred. Its shape is extremely wonderful and divine and it has originated from fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)