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mahabharat 13.86.41: ऋषियों ने कहा - हे भृगु नन्दन! हमने सुना है कि यहाँ गौ, भूमि और धन का दान करने से पापी मनुष्य भी पवित्र हो जाता है॥41॥   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.86.41 
ऋषय ऊचु:
गाश्च भूमिं च वित्तं च दत्त्वेह भृगुनन्दन।
पापकृत् पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों ने कहा - हे भृगु नन्दन! हमने सुना है कि यहाँ गौ, भूमि और धन का दान करने से पापी मनुष्य भी पवित्र हो जाता है॥41॥
 
The sages said - O Bhrigu Nandan! We have heard that a sinful person becomes pure by donating cow, land and wealth here. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)