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mahabharat 13.86.31-32: महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करके, ब्राह्मणों और क्षत्रियों द्वारा पूजित तथा समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाले वीर कमल-नेत्र परशुराम ने अश्वमेध यज्ञ किया।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  13.86.31-32 
ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचन:॥ ३१॥
आजहार क्रतुं वीरो ब्रह्मक्षत्रेण पूजितम्।
वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करके, ब्राह्मणों और क्षत्रियों द्वारा पूजित तथा समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाले वीर कमल-नेत्र परशुराम ने अश्वमेध यज्ञ किया।
 
Maharaj! After this, having conquered the entire earth, the brave lotus-eyed Parashurama, who is respected by the Brahmins and Kshatriyas and who fulfils all the desires, performed the Ashwamedha Yagna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)