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mahabharat 13.86.23-25h: हे पृथ्वीपति! यहाँ शास्त्रों को प्रमाण मानकर आपने आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितर, ऋषि, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी का सम्मान बढ़ाया है। तथा धर्म में स्थित मनुष्यों को अपना आदर्श दिखाकर उन्हें विचलित नहीं होने दिया है। ॥23-24 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 23-25h
 
 
श्लोक  13.86.23-25h 
त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव॥ २३॥
आत्मा धर्म: श्रुतं वेदा: पितरश्चर्षिभि: सह।
साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापति:॥ २४॥
प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिता:।
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीपति! यहाँ शास्त्रों को प्रमाण मानकर आपने आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितर, ऋषि, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी का सम्मान बढ़ाया है। तथा धर्म में स्थित मनुष्यों को अपना आदर्श दिखाकर उन्हें विचलित नहीं होने दिया है। ॥23-24 1/2॥
 
Lord of the Earth! By accepting the scriptures as proof here, you have increased the respect of the soul, religion, scriptures, Vedas, ancestors, sages, Guru, Prajapati and Brahmaji. And by showing your ideal to those who are established in religion, you have not let them deviate. ॥ 23-24 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)