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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना
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श्लोक 21
श्लोक
13.86.21
शास्त्रमार्गानुसारेण तद् विद्धि मनुजर्षभ।
तत: सोऽन्तर्हितो बाहु: पितुर्मम जनाधिप॥ २१॥
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! आपको यह जानना चाहिए कि मैंने शास्त्रीय मार्ग का अनुसरण करके ही सब कुछ किया। नरेश्वर! उसके बाद मेरे पिता की वह भुजा लुप्त हो गई। 21॥
Narashrestha! You should know that I did everything by following the classical path. Nareshwar! After that that arm of my father disappeared. 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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