Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.86.11: जब मेरे परम तेजस्वी पिता महाराज शान्तनुक का देहान्त हुआ, तब मैं उनका श्राद्ध करने के लिए गंगाद्वार तीर्थ (हरिद्वार) गया था॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.86.11 
पिता मम महातेजा: शान्तनुर्निधनं गत:।
तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गंगाद्वारमुपागमम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जब मेरे परम तेजस्वी पिता महाराज शान्तनुक का देहान्त हुआ, तब मैं उनका श्राद्ध करने के लिए गंगाद्वार तीर्थ (हरिद्वार) गया था॥ 11॥
 
When my very illustrious father Maharaja Shantanuka passed away, I went to the Gangadwar Tirtha (Hardwar) to perform his Shraddha.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)