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श्लोक 13.85.52  |
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम्।
न किंचिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत॥ ५२॥ |
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| अनुवाद |
| विद्यार्थी को विद्या मिलती है और सुख चाहने वाले को सुख मिलता है। भारत! यहाँ गौ-पूजक के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। 52। |
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| The student gets knowledge and the seeker of happiness gets happiness. India! Nothing is rare here for a cow-worshipper. 52. |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोलोकवर्णने त्र्यशीतितमोऽध्याय:॥ ८३॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोलोकका वर्णन विषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८३॥
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