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श्लोक 13.85.39  |
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषा:।
यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत् ते सम्पत्स्यते शुभे॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| हे शुभ्र! हे देवि! तुम अपने मन में जो भी दिव्य या मानवीय सुखों का चिन्तन करोगी तथा जो भी स्वर्गीय सुख तुम्हें प्राप्त होंगे, वे सब तुम्हें स्वतः ही प्राप्त हो जायेंगे ॥39॥ |
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| Devi! O auspicious one! Whatever divine or human pleasures you contemplate in your mind and whatever heavenly happiness you will have, you will automatically receive them all. ॥ 39॥ |
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