श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 85: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  13.85.39 
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषा:।
यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत् ते सम्पत्स्यते शुभे॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे शुभ्र! हे देवि! तुम अपने मन में जो भी दिव्य या मानवीय सुखों का चिन्तन करोगी तथा जो भी स्वर्गीय सुख तुम्हें प्राप्त होंगे, वे सब तुम्हें स्वतः ही प्राप्त हो जायेंगे ॥39॥
 
Devi! O auspicious one! Whatever divine or human pleasures you contemplate in your mind and whatever heavenly happiness you will have, you will automatically receive them all. ॥ 39॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd